Neem Karoli Baba Biography in Hindi : कौन हैं नीम करोली बाबा, देश-विदेश तक में प्रख्यात, जिन्हें भक्त मानते हैं हनुमान जी का अवतार 

Neem Karoli Baba: नीम करोली बाबा 20वीं सदी के प्रसिद्ध संतों में एक हैं. बाबा की ख्याति देश-विदेश तक फैली है. 17 साल में ही बाबा को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. भक्त इन्हें हनुमान जी का अवतार मानते हैं.


Neem Karoli Baba Biography in Hindi: नीम करोली बाबा को केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध संत के रूप में जाना जाता है. ये 20वीं सदी के महान संतों में एक थे, जिनके दर्शन के लिए बड़ी-बड़ी हस्तियां भी लालायित रहती थीं.

चारों ओर पहाड़ों से घिरी वादियों के मनमोहक दृश्य को देखकर सभी लोग रोमांच से भर जाते हैं. इस रोमांच की ऊर्जा का कारण उत्तराखंड के नैनीताल स्थित कैंची धाम मंदिर है. इस मंदिर का अपना खासा महत्व है और यहां के नीम करौली बाबा को मानने वालों की संख्या अनगिनत है. यह देश ही नहीं विदेशों भी काफी लोकप्रिय हैं. वह अपने एक साधारण जीवन, पर उनके द्वारा किए गए चमत्कारों को आज भी भी याद किया जाता है. 15 जून को कैंची धाम के 60वां स्थापना दिवस मनाया जाता है. इस दिन बेहद उत्साह के साथ भंडारे का आयोजन किया जाता है. आइए जानते हैं नीम करोली बाबा के बारे में विस्तार से.

कौन हैं नीम करोली बाबा

20वीं सदी के महान संतों में शामिल नीम करोली बाबा अपनी दिव्य शक्तियों के कारण काफी लोकप्रिय हैं. वह बजरंगबली के भक्त थे. मान्यताओं के अनुसार, नीम करोली बाबा को कलयुग में उनको साक्षात भगवान हनुमान के रूप में दखते थे. वहीं लोग उन्हें भगवान हनुमान का अवतार मानते थे. नीम करोली बाबा का बचपन का नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था. संत बनने के नाद उन्हें लक्ष्मण दास, नीम करोली बाबा, तिकोनिया वाले बाबा और तलईया बाबा जैसे नामों से जाना जाता था. हालांकि, उनकी जन्म के दिन का किसी को पता नहीं है पर 11 सितम्बर 1973, को वृन्दावन में उन्होंने अपना देह त्याग किया.

नीम करौली बाबा का बचपन

महाराजजी के नाम से प्रख्यात नीम करौली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक धनी ब्राह्मण जमींदार परिवार में हुआ था. उनका जन्म मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष अष्टमी को हुआ था और उनके पिता दुर्गा प्रसाद शर्मा ने उनका नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा रखा था. बचपन से ही महाराजजी सांसारिक मोह-माया से विरक्त थे. 11 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक संपन्न ब्राह्मण परिवार की लड़की से हुआ था. विवाह के तुरंत बाद महाराजजी घर छोड़कर गुजरात चले गए. वे गुजरात और पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर समय समय पर घूमते रहे. लगभग 10-15 वर्षों के बाद उनके पिता को किसी ने बताया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गांव में एक साधु को देखा है जो उनके बेटे जैसा दिखता था. उनके पिता तुरंत अपने बेटे से मिलने और उसे लेने के लिए नीब करौरी गांव पहुंचे. वहां उन्होंने महाराज जी से मुलाकात की और उन्हें घर वापस जाने का आदेश दिया. महाराज जी ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और वापस लौट आए. यह महाराज जी के दो अलग-अलग तरह के जीवन की शुरुआत थी. एक गृहस्थ का और दूसरा संत का. उन्होंने गृहस्थ के अपने दायित्व को पूरा करने के लिए समय दिया और साथ ही साथ अपने बड़े परिवार यानी दुनिया की देखभाल भी करते रहे. हालांकि, गृहस्थ या संत के कर्तव्यों का निर्वहन करते समय उनके जीवन और जीने की शैली में कोई अंतर नहीं था. एक गृहस्थ के रूप में उनके परिवार में उनके दो बेटे और एक बेटी हैं.

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विश्व भर में प्रख्यात हैं नीम करोली बाबा मदिर

हिन्दू धार्मिक तीर्थस्थलों में से एक कैंची धाम आश्रम श्रद्धालुओं के बीच काफी प्रसिद्ध है. संत नीम करोली बाबा ने यहां एक आश्रम को स्थापित किया था, जो काफी लोकप्रिय और शांतिपूर्ण आश्रय स्थल बन गया. आंतरिक शांति की तलाश में लोग यहां आते हैं. उत्तराखंड की सुरम्य पहाड़ियों पर स्थित कैंची धाम एक आध्यात्मिक केंद्र है, जहां की वादियां आपके दिलों-दिमाग को निलकुल शांत कर देंगी. हाल ही के दिनों में नीम करोली बाबा के कैंची धाम आश्रम की लोकप्रियता बढ़ गई है. पिछले वर्षों में क्रिकेट और मनोरंजन जगत की कई हस्तियां और देश-विदेश के दिग्गज कारोबारी नीम करोली बाबा के आश्रम आते रहते हैं. हाल ही में विराट कोहली और अनुष्का शर्मा भी वहां गए ही.

कब जाएं नीम करोली आश्रम

अगर आप भी नीम करोली बाबा के आश्रम जाना जाते हैं . और सही समय की तलाश कर रहे हैं तो मार्च से जून तक का समय सबसे रहेगा. वहीं सितंबर से नवंबर के बीच भी कैंची धाम घूमने जाया जा सकता हैं. इन महीनों में मौसम सुहाना होता है और नीम करोली बाबा आश्रम के आसपास का प्राकृतिक परिवेश सफर के लिए काफी रोमांचित होता है. वहीं जुलाई-अगस्त में मानसून के वजह से पहाड़ी क्षेत्र में जाने से बचना चहाइए.

नीम करोली बाबा का जीवन परिचय

Neem Karoli Baba Biography in Hindi. गुजरात के बाद बबनिया से महाराज जी देश भर की यात्रा पर निकल पड़े. यात्रा करते-करते वे फर्रुखाबाद जिले के “नीब करोड़ी” गांव में पहुंचे और वहां कुछ देर विश्राम करने के लिए रुके. महाराज जी की वाणी दिव्य थी और यद्यपि उनका गांव वालों से बहुत कम संपर्क था, फिर भी उन्होंने जो कुछ भी कहा, वह सच हुआ. वे उनसे जुड़ गए और उनसे रहने की प्रार्थना करने लगे. उन्होंने उनके लिए एक भूमिगत गुफा बनाई, जिसमें वे दिन भर साधना में लीन रहते थे. किसी ने उन्हें शौच के लिए भी बाहर निकलते नहीं देखा. वे रात के अंधेरे में ही बाहर निकलते थे. बाद में पुरानी गुफा से लगभग दो सौ मीटर दूर गोवर्धन नामक ब्राह्मण की उपेक्षित भूमि पर एक नई गुफा (जो आज भी मौजूद है) खोदी गई. महाराज जी ने इस गुफा की छत पर हनुमान मंदिर बनवाया और प्राण-प्रतिष्ठा के दिन उन्होंने अपने लंबे, उलझे हुए बाल मुंडवा लिए और लंगोटी के स्थान पर एक लंबी सूती धोती पहनने लगे.

नई गुफा में जाने के बाद महाराज जी ने गांव वालों से मिलना-जुलना शुरू कर दिया. वे अपने आयु वर्ग के युवाओं से मित्रवत व्यवहार करने लगे और अक्सर उनके खेलों में भाग लेने लगे. वे उनसे इतनी सहजता से घुल-मिल गए कि उनके लिए उनके अद्भुत कारनामों की ख़ासियतों से अभिभूत होना संभव ही नहीं था. लुका-छिपी खेलते समय वे जंगल में कहीं भी छिपे किसी भी व्यक्ति को तुरंत ढूँढ़ लेते थे, लेकिन जब उनकी बारी आती तो वे अदृश्य हो जाते और कहीं नहीं मिलते. जंगल में पेड़ों पर चढ़ते समय उनके पीछा करने वाले एक पेड़ पर चढ़ते और फिर उन्हें दूसरे पेड़ पर बैठे हुए देखते. किसी ने उन्हें पेड़ से पेड़ पर छलांग लगाते नहीं देखा. गांव के तालाब में तैरते समय बाबा पानी में गायब हो जाते और काफी देर बाद बाहर आते. यह सब उनके लिए आश्चर्य और मनोरंजन का विषय था. इस दौरान गोपाल नाम का एक गरीब पक्षी पकड़ने वाला व्यक्ति महाराज जी का परम भक्त बन गया और प्रतिदिन उनके पास आता. एक दिन महाराज जी की आज्ञा भूलकर कि गुफा में प्रवेश नहीं करना है, गोपाल दूध का बर्तन लेकर अंदर चला गया. उसने देखा कि महाराज जी ध्यान में लीन हैं और उनके शरीर पर सर्प लिपटे हुए हैं. महाराज जी को शिव रूप में देखकर वह इतना भयभीत हो गया कि उसके पैर लड़खड़ा गए और दूध का बर्तन उसके हाथ से छूट गया. वह बाहर भागा और बेहोश हो गया. महाराज जी बाहर आए और उसे उठाते हुए कहा, “तुम्हें बिना आज्ञा के गुफा में प्रवेश नहीं करना चाहिए था.”

महाराज जी के स्पर्श मात्र से गोपाल को होश आ गया. एक बार महाराज जी को कई दिनों तक भोजन नहीं मिला. यह उनकी लीला ही थी. गांव वालों ने बताया कि वे बहुत उत्तेजित लग रहे थे. उन्होंने हनुमान (शिव के अवतार और भगवान राम के प्रिय भक्त, वे दुखों को दूर करने वाले, आशीर्वाद के अवतार और लोगों और भगवान के बीच सेतु हैं) की पवित्र छवि पर चिल्लाते हुए कहा, “क्या आप मुझे भूखा मार देंगे?” उसके ये शब्द कहते ही कई लोग फलों और मिठाइयों से भरे थाल लेकर मंदिर में आ गए. देवता का अनादर करना एक अकल्पनीय कार्य था, लेकिन गांव वालों का मानना ​​था कि महाराज जी ऐसा इसलिए कर सकते हैं क्योंकि वे हनुमान के भक्त नहीं बल्कि स्वयं हनुमान के भक्त थे. एक दिन महाराज जी गंगा की ओर जा रहे थे, जहाँ वे एकादशी और पूर्णिमा के शुभ दिनों में स्नान करते थे. वे अपने भक्त गोपाल और एक मुस्लिम साथी के साथ जा रहे थे जब उन्होंने फर्रुखाबाद की ओर जाने वाली एक ट्रेन देखी जिस पर वे यात्रा करना चाहते थे. चलती ट्रेन, जो लगभग दो सौ मीटर दूर थी, अचानक रुक गई और तब तक आगे नहीं बढ़ी जब तक कि महाराज जी और उनके सेवक उसमें सवार नहीं हो गए. जैसे ही महाराज जी बैठे, ट्रेन ने अपनी यात्रा जारी रखी. बाद में, ग्रामीणों के अनुरोध पर, जो इस घटना की स्मृति को जीवित रखना चाहते थे, भारत सरकार ने उस स्थान पर एक रेलवे स्टेशन की स्थापना की जहां बाबा सवार हुए थे और इसका नाम महाराज जी के नाम पर बाबा लक्ष्मण दास पुरी स्टेशन रखा. (नीब करोरी के ग्रामीण महाराज जी को बाबा लक्ष्मण दास कहते थे.)

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